Monday, 7 November 2016

Honey Bee Farming in India

Honey Bee Farming in India

BEE FARMING TIPS IN HINDI


Honey and beekeeping have a long history in India. Honey bee farming is quite interesting. It is one of the most enjoyable types of businesses out there. The honey bee extracts honey from its natural surroundings and then converts it into something that is consumable. In addition, honey bees help to pollinate the vegetables and fruits in one’s area. The following are some of the aspects involving
         In India beekeeping has been mainly forest based. Several natural plant species provide nectar and pollen to honey bees. Thus, the raw material for production of honey is available free from nature. Bee hives neither demand additional land space nor do they compete with agriculture or animal husbandry for any input. The beekeeper needs only to spare a few hours in a week to look after his bee colonies. Beekeeping is therefore ideally suited to him as a part-time occupation. Beekeeping constitutes a resource of sustainable income generation to the rural and tribal farmers. It provides them valuable nutrition in the form of honey, protein rich pollen and brood. Bee products also constitute important ingredients of folk and traditional medicine.
        The establishment of Khadi and Village Industries Commission to revitalize the traditional village industries, hastened the development of beekeeping. During the 1980s, an estimated one million bee hives had been functioning under various schemes of the Khadi and Village Industries Commission. Production of apiary honey in the country reached 10,000 tons, valued at about Rs. 300 million.
        Side by side with the development of apiculture using the indigenous bee, Apis cerana, apiculture using the European bee, Apis mellifera, gained popularity in Jammu & Kashmir, Punjab, Himachal Pradesh, Haryana, Uttar Pradesh, Bihar and West Bengal. Wild honey bee colonies of the giant honey bee and the oriental hive bee have also been exploited for collection of honey. Tribal populations and forest dwellers in several parts of India have honey collection from wild honey bee nests as their traditional profession. The methods of collection of honey and beeswax from these nests have changed only slightly over the millennia. The major regions for production of this honey are the forests and farms along the sub-Himalayan tracts and adjacent foothills, tropical forest and cultivated vegetation in Rajasthan, Uttar Pradesh, Madhya Pradesh, Maharashtra and Eastern Ghats in Orissa and Andhra Pradesh.
Honey Bee Farming in Rajasthan


राजस्थान के भरतपुर जिले की पहचान केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान के साथ-साथ शहद उत्पादक जिले के रूप में बनती जा रही है। यदि पर्यावरणीय परिस्थितियां अनुकूल रहीं तथा सरकार द्वारा शहद का समर्थन मूल्य घोषित किया जाता रहा तो भरतपुर राजस्थान में सबसे अधिक शहद उत्पादन करने वाला जिला बन जायेगा।
गत वर्ष इस जिले में 960 मीट्रिक टन शहद उत्पादन हुआ जो एक रिकार्ड उत्पादन है। यह रिकार्ड भी टूट सकता है अगर तीन चीजें साथ दें। आगामी सर्दियों के मौसम में कोहरा जैसी स्थिति पैदा न हो। केन्द्र सरकार शहद का समर्थन मूल्य घोषित कर दे और राष्ट्रीय मधुमक्खी पालन बोर्ड को पुनर्गठित कर इसे क्रियाशील बना दिया जाए तो भरतपुर जिले में शहद का उत्पादन बढ़ कर 1100 मी. टन तक पहुंच जायेगा। यदि शहद का समर्थन मूल्य 500 रुपये क्विंटल भी घोषित कर दिया तो यह व्यवसाय इतनी तेजी से बढ़ेगा कि राजस्थान के सरसों उत्पादक जिलों में करीब 25 से 30 हजार युवकों को अतिरिक्त रोजगार के अवसर प्राप्त होंगे। साथ ही पैदावार भी 15 से 20 प्रतिशत बढ़ जायेगी।
मधुमक्खी पालन का व्यवसाय भरतपुर जिले में लुपिन ह्यूमन वेलफेयर एण्ड रिसर्च फाउंडेशन द्वारा करीब 6 वर्ष पूर्व शुरू कराया गया। धीरे-धीरे यह व्यवसाय अन्य जिलों जैसे धौलपुर, अलवर, करौली एवं सवाई माधोपुर में भी फैल गया। पिछले तीन वर्षों में यह व्यवसाय इतनी तेजी से आगे बढ़ा कि करीब 2 हजार युवक इस व्यवसाय से किसी न किसी रूप में जुड़ गये। पिछले वर्ष शहद के दामों में आई गिरावट का हल्का सा असर इस संख्या के ऊपर पड़ा। लेकिन चूंकि अब शहद प्रसंस्करण यूनिट चालू हो गयी है, इसलिए यह उम्मीद की जा सकती है कि यह व्यवसाय अब छोटे-मोटे झटकों से प्रभावित नहीं होगा। साथ ही रोजगार के नए अवसर भी पैदा होंगे। शहद प्रसंस्करण यूनिट के कारण मधुमक्खी पालक शहद निर्यातक को औने-पौने दामों में शहद बेचने की बजाए अब खुद शहद को प्रसंस्करण कराने के बाद उचित मूल्य पर बेचेंगे। लुपिन संस्था इस व्यवसाय को तेजी से आगे बढ़ाने के लिये अब तक करीब 3 हजार युवकों को मधुमक्खी पालन का प्रशिक्षण दे चुकी है। मधुमक्खी पालन व्यवसाय की खातिर लिए गये ऋण पर खादी ग्रामोद्योग भी करीब 30 प्रतिशत का अनुदान उपलब्ध कराने का कार्य कर रहा है।
लुपिन के अधिशाषी निदेशक सीताराम गुप्ता का कहना है कि यदि राजस्थान के सरसों उत्पादक करीब 11 जिलों में यह कार्य शुरू कराया जाये तो प्रतिवर्ष लगभग 50 हजार युवाओं को रोजगार मिल सकेगा। उनका कहना था यदि राज्य सरकार स्कूली बच्चों के लिये संचालित मिड-डे मील योजना में दस ग्राम शहद उपलब्ध कराना भी शुरू कर दे तो इससे बच्चों को उपयोगी खनिज पदार्थ और विटामिन प्राप्त होंगे, जिससे उनका स्वास्थ्य अधिक बेहतर होगा। साथ ही राज्य के मधुमक्खी पालकों को स्थानीय बाजार उपलब्ध हो सकेगा। अभी तक हमारे देश में शहद की प्रति व्यक्ति खपत 8 ग्राम से भी कम है जबकि जर्मन लोग शहद की गुणवत्ता एवं उपयोगिता से परिचित होने के कारण विश्व में सर्वाधिक मात्रा में इसका उपयोग करते हैं। वहां प्रति व्यक्ति शहद की खपत करीब 2 किलोग्राम है। इसी कारण जर्मनी सर्वाधिक शहद का आयात करता है। शहद की मांग की पूर्ति करने में चीन सबसे आगे है। वह प्रतिवर्ष 80 हजार टन शहद निर्यात करता है। भारत की बात करें तो यह 7 हजार टन शहद निर्यात कर रहा रहा है जिसे आसानी से बढ़ाकर प्रतिवर्ष 25 हजार टन किया जा सकता है।
भरतपुर जिले में मधुमक्खी पालन व्यवसाय के फलने-फूलने का मुख्य कारण करीब एक लाख 70 हजार हेक्टेयर क्षेत्रफल में बोई जाने वाली सरसों की फसल एवं मौसमी परिस्थितियां हैं। मधुमक्खियों को मध्य अक्टूबर से जनवरी माह के अंत तक सरसों की फसल से मकरंद एवं पराग प्रचुर मात्रा में मिलता है। इन दिनों तापमान भी 20 डिग्री सेंटीग्रेड से अधिक नहीं रहता है। इस कारण मधुमक्खियां अपना काम अधिक गति से करती हैं जिससे मधुमक्खियों के छत्ते एक सप्ताह में शहद से भरने लगते हैं। मकरंद एवं पराग से बना शहद घी की तरह जमा हुआ होता है। इसकी विदेशों में भारी मांग होती है। क्योंकि वहां डबल रोटी पर मक्खन के स्थान पर शहद लगाकर खाने का प्रचलन बढ़ा है।
इस व्यवसाय को गति देने में सबसे महत्वपूर्ण कारण यह भी रहा कि शहद के विपणन के लिये मधुमक्खी पालकों को कहीं और नहीं जाना पड़ता बल्कि शहद के निर्यातक सीधे मधुमक्खी पालकों से ही शहद खरीद लेते हैं। यहां यह उल्लेखनीय है कि जिस फसल अथवा वृक्षों के फूलों से मधुमक्खियां मकरंद एकत्रित करके लाती हैं उसी के अनुरूप शहद की रंगत, खुशबू एवं किस्म बन जाती है। जिसकी वजह से अलग-अलग फसलों के शहद की कीमत भी अलग-अलग रहती है।
इसके अलावा एक और कारक है जिसने इस व्यवसाय की वृद्धि की है। वह यह कि जिस फसल के पास मधुमक्खियों के डिब्बों को रखा जाता है उस फसल के उत्पादन में करीब 20 प्रतिशत की वृद्धि हो जाती है। इसके पीछे रहस्य यह है कि मधुमक्खियां मकरंद एकत्रित करते समय फसलों के फूलों से पराग कण अपने पंखों व पैरों के साथ चिपकाकर एक फूल से दूसरे फूल तक ले जाने में सहायक होती हैं। अनजाने में ही उनकी इस क्रिया से परागण में वृद्धि होती है। परिणाम स्वरूप फसलों का उत्पादन बढ़ जाता है। मधुमक्खियों में मजदूर मक्खी मकरंद के लिये आस-पास के 2 किलोमीटर वर्ग क्षेत्रफल में घुम फिरकर मकरंद एकत्रित करती है।
मधुमक्खी पालन के लिए इटालियन एपीसमेलोफेरा नामक मधुमक्खी उपयुक्त सिद्ध हुई है जो इस क्षेत्र की आदर्श मौसमी परिस्थियों में बेहतर ढंग से कार्य कर अधिक से अधिक शहद का उत्पादन करती है। मधुमक्खी पालन के व्यवसाय में शहद के अलावा रायल जैली, पराग कण, गोंद एवं मोम का उत्पादन भी होता है, किन्तु आवश्यक संसाधन व तकनीकी सुविधा उपलब्ध नहीं होने के कारण अभी तक शहद के अलावा अन्य पदार्थों का लाभ प्राप्त नहीं किया जा रहा है जबकि इनका विक्रय मूल्य शहद से कई गुना अधिक है।
मधुमक्खी पालन व्यवसाय की दो सबसे बड़ी दिक्कतें हैं। पहली दिक्कत है फूलों की अनुपलब्धता और दूसरा बढ़ता तापक्रम। अगर पर्याप्त फूल न रहें और तापमान अधिक रहा तो मधुमक्खियों के लिए शहद उत्पादित कर पाना कठिन हो जाता है। 20 डिग्री से ज्यादा तापमान हुआ तो मधुमक्खियों की मृत्युदर बढ़ जाती है। जब सरसों की फसल समाप्त हो जाती है तो इन्हें उतने फूल ही नहीं मिलते हैं कि ये शहद बना सकें। इसीलिए इन्हें उतरांचल अथवा तराई क्षेत्रों में ले जाना पड़ता है जहां तापमान कम होता है और अनेक जंगली वनस्पतियों के फूल उपलब्ध होते हैं।
मधुमक्खी पालन की 50 डिब्बों की एक आदर्श यूनिट के लिए करीब 1 लाख 50 हजार रुपये व्यय करने पड़ते हैं। एक वर्ष में ही इन डिब्बों से 2500 किलोग्राम शहद मिल जाती है। साथ ही डिब्बों की संख्या भी दोगुनी हो जाती है जिससे एक ही वर्ष में मधुमक्खी पालक की लागत वसूल हो जाती है और अगले वर्ष से उसको औसतन 2 लाख प्रतिवर्ष मुनाफा मिलना प्रारम्भ हो जाता है।
यदि शहद का समर्थन मूल्य 500 रुपये क्विंटल भी घोषित कर दिया जाए तो यह व्यवसाय इतनी तेजी से बढ़ेगा कि राजस्थान के सरसों उत्पादक जिलों में करीब 25 से 30 हजार युवकों को अतिरिक्त रोजगार के अवसर प्राप्त होंगे। साथ ही पैदावार भी 15 से 20 प्रतिशत बढ़ जायेगी।

Friday, 9 September 2016

Wheat Farming Tips In Hindi

Wheat Farming Tips In Hindi

Wheat is the main cereal crop in India. The total area under the crop is about 29.8 million hectares in the country. The production of wheat in the country has increased significantly from 75.81 million MT in 2006-07 to an all time record high of 94.88 million MT in 2011-12. The productivity of wheat which was 2602 kg/hectare in 2004-05 has increased to 3140 kg/hectare in 2011-12. The major increase in the productivity of wheat has been observed in the states of Haryana, Punjab and Uttar Pradesh. Higher area coverage is reported from MP in recent years.
गेहूँ के बारे में
गेहूं भारत में मुख्य अनाज वाली फसल है। देश में यह फसल लगभग 29.8 मिलियन हेक्टेयर में उगाई जाती है। 
देश में गेहूँ का उत्पादन 2006-07 में 75.81 मिलियन एमटी से 2011-12 में काफी बढ़कर 94.88 मिलियन एमटी
 के रिकार्ड पर पहुँच गया। 2004-05 जो गेहूँ की उत्पादकता 2602 किग्रा/ हेक्टेयर थी वह 2011-12 में बढ़कर 
3140 किग्रा/ हेक्टेयर
 हो गई है। गेहूँ के उत्पादन में प्रमुख वृद्धि हरियाणा, पंजाब और उत्तर प्रदेश राज्यों में देखा गया है। 
हाल के वर्षोें में मध्य प्रदेश में अधिक क्षेत्र में इसको बोना देखा गया है।.
भारतीय गेहूँ मुलायम/ मध्यम कठोर, मध्यम प्रोटीन, सफेद ब्रेड गेहूँ, कुछ हद तक यू.एस. कठोर सफेद गेहूँ के समान होता है।
 मध्य और पश्चिमी भारत में उगाया जानेवाला गेहूं आम तौर पर कठोर, उच्च प्रोटनी वाला और उच्च ग्लूटेन वाला होता है। 
भारत में 1.0-1.2 मिलियन टन डुरुम गेहूँ भी उत्पादित होता है, जो अधिकतर मध्यम प्रदेश में होता है। अधिकतर भारतीय
 डुरुम बाजार यार्डों में अलगाव की समस्याओं के कारण अलग से विपणित नहीं होता है। हालांकि, मूल्य प्रीमियम पर प्राइवेट
 ट्रेड द्वारा कुछ मात्रा में खरीदा जाता है, मुख्य रूप से उच्च मान / ब्रांडेड उत्पादों के प्रोसेसिंग के लिए।.
में भारत के स्वतंत्र के समय गेहूँ का उत्पादन एवं उत्पादकता बहुत कम थी। 1950-51 में गेहूँ का उत्पादन केवल 6.46 
मिलियन टन और उत्पादकता केवल 663 किग्रा प्रति हेक्टेयर थी, जो भारतीय आबादी के लिए पर्याप्त नहीं थी। 
हमारा देश पीएल-480 के तहत यूएसए जैसे कई देशों से हमारे लोगों की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए बड़ी मात्रा
 में गेहूँ आयात करता। उस समय गेहूँ के कम उत्पादन और उत्पादकता के कारण, क) उपजाऊ मिट्टी में उगाने के
 समय लॉजिंग के परिणामस्वरूप लंबे उगानेवाले पौधे थे, ख) प्रयुक्त किस्मों की खराब टिलरिंग औक सिंक क्षमता, ग) रोगों 
के लिए अधिक संवेदनशीलता, घ) थर्मो और फोटो वेरियन इत्यादि के लिए उच्च संवेदनशीलता जिससे खराब अनुकूलन तथा,
 च) पौध के तैयार होने में लंबा समय जिससे मौसम की प्रतिकूलता के साथ ही रोगों, कीटों आदि की अधिकता।.
भारत सरकार ने प्रचलित भारतीय पारिस्थितिक स्थितियों के तहत फसल उत्पादकता बढ़ाने की व्यवहार्यता का आकलन 
करने के लिए 1961 में एक आयोग नियुक्त की। भारत सरकार द्वारा अपनाए गए विभिन्न चरणों के परिणामस्वरूप हमारे
 देश में गेहूँ परिदृश्य पूरी तरह से बदल गया है। उत्तर स्वतंत्रता युग में देश हमारी आवश्यकताओं के लिए गेहूँ का आयात 
करता लेकिन 60 के बाद के दशकों में हरित क्रांति अवधि में गेहूँ के उत्पादन व उत्पादकता में अत्यधिक वृद्धि के कारण 
हमारा देश गेहूँ उत्पादन में आत्म निर्भर हो गया। वर्तमान में, हमारे देश में आवश्यकता से अधिक गेहूँ का उत्पादन हो रहा है 
और गोदाम गेहूँ से पूरी तरह भरे हुए हैं।.
भारत में गेहूं उत्पादक क्षेत्र
देश के सम्पूर्ण गेहूं उत्पादक क्षेत्रों को निम्नलिखित 6 प्रमुख क्षेत्रों में वर्गीकृत किया गया है

क्षेत्रशामिल राज्य/क्षेत्रलगभग क्षेत्रफल (लाखहेक्टेयर)
उत्तरी पहाड़ी क्षेत्र (एनएचजेड)जम्मू कश्मीर के पहाड़ी क्षेत्र (जम्मू, कठुआ और सांबाजिलों को छोड़कर), हिमाचलप्रदेश (ऊना & पोंटा घाटी को छोड़कर), उत्तराखंड (तराई क्षेत्र को छोड़कर) और सिक्किम0.8
उत्तरी पश्चिमी मैदानी क्षेत्र (एनडब्ल्यूपीजेड)पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी यूपी (झाँसी खंड को छोड़कर), राजस्थान (कोटा और उदयपुर खंड को छोड़कर), दिल्ली, उत्तराखंड का तराई क्षेत्र, ऊना और एचपी का पाओंता घाटी, जे व के का जम्मू, सांबा व कथुआ जिले तथा चंडीगढ़।.11.55
उत्तरी पूर्वी मैदानी क्षेत्र (एनईपीजेड)पूर्वीउत्तर प्रदेश (28 जिले), बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल, असम, उड़ीसा और अन्य पूर्वोत्तर राज्य (सिक्किम को छोड़कर)10.5
केन्द्रीय क्षेत्रमध्य प्रदेश, गुजरात, छत्तीसगढ़, राजस्थान के कोटा व उदयपुर प्रभाग तथा यूपी का झाँसी प्रभाग।.5.2
प्रायद्वीपीय क्षेत्रमहाराष्ट्र, तमिलनाडु (नीलगिरी और पलानी की पहाड़ियों को छोड़कर),कर्नाटक और आंध्रप्रदेश1.6
दक्षिणी पहाड़ी क्षेत्र (एसएचजेड)तमिलनाडु के नीलगिरी और पलानी की पहाड़ियाँ0.1
जलवायु आवश्यकता
गेहूं की विस्तृत अनुकूलनशीलता है। यह न केवल उष्णकटिबंधीय और उप उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में उगाया जा सकता है 
अपितु सुदीर उत्तर के ठंडे क्षेत्रों और शीतोष्ण कटिबंध में भी, 60 डिग्री से उत्तर ऊंचाई पर भी। गेहूँ कड़ाके की ठंड और
 बर्फ सहन कर सकता है और वसंत ऋतु में गर्म मौसम में सेटिंग के साथ वृद्धि कर सकता है। यह समुद्र तल से 3300 मीटर
 की ऊंचाई तक उगाया जा सकता है।.

सबसे अच्छा गेहूँ उगाने के लिए गेहूँ को अच्छी तरह से पकने के लिए सूखे, गर्म मौसम के साथ उगने के प्रमुख भाग के 
दौरान ठंड, नम मौसम के साथ इष्ट क्षेत्र होने चाहिए। गेहूँ बीजों के आदर्श अंकुरण के लिए अनुकूल तापमान 20-25 
सेल्सियस होता है, 3.5 से 35 सी के तापमान में बीज अंकुरित हो सकते हैं। अंकुरण में बाधा के बाद बारिश और अंकुर 
को बढ़ावा देने के लिए तुषार। एक गर्म और नम जलवायु वाले क्षेत्र गेहूँ के लिए उपयुक्त नहीं होते।.
हेडिंग और फूल वाले चरणों के दौरान, जरूरत से ज्यादा उच्च या कम तापमान और सूखा गेहूँ के लिए हानिकारक हैं। 
उच्च आर्द्रता और कम तापमान के साथ बादल वाले मौसम, रस्ट के हमले के लिए अनुकूल हैं। गेहूँ के पौध को पकने के
 समय 14-15 डिग्री सें. अनुकूल औसत तापमान की आवश्यकता होती है। अनाज बनने और विकास के समय तापमान 
स्थितियां उपज के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं। इस अवधि के दौरान 250 डि. सें. से अधिक तापमान से गेहूँ के वजन 
कम कर देते हैं। जब तापमान अधिक होता है, तो अत्यधिक ऊर्जा पौधों के ट्रांसपिरेशन प्रक्रिया के माध्यम से चली जाती है
 और कम बची ऊर्जा से अनाज अच्छी तरह नहीं बन जाते और उपज भी प्रभावित हो जाती है। 
भारत में गेहूँ मुक्य रूप से रबि (जाड़े) की फसल है।.
मिट्टी
गेहूँ भारत में विभिन्न प्रकार की मिट्टियों में बोया जाता है। दोमट या दोमट बनावट वाली मिट्टी, अच्छी संरचना और जल
 धारण वाली मिट्टी गेहूँ के लिए उपयुक्त होती है। बहुत झरझरे और जरूरत से ज्यादा सूखे तेलों से बचने के लिए सावधानी 
रखनी चाहिए। मिट्टी प्रतिक्रिया के लिए तटस्थ होनी चाहिए। अच्छे ड्रेनेज वाली भारी मिट्टी सूखी स्थितियों में गेहूँ उगाने के लिए 
उपयुक्त होती है। यह मिट्टी अच्छी तरह वर्षा जल को सोख लेती है और बरकरार रखती है। बेकार संरचनावाली और बेकार 
ड्रेनेज वाली भारी मिट्टी गेहूँ के लिए उपयुक्त नहीं होती क्योंकि यह जल निकासी के लिए अच्छी नहीं होती। जल और पोषक
 क्षमता में सुधार करके हल्की मिट्टी में भी सफलतापूर्वक गेहूँ उगाया जा सकता है।.
उर्वरक प्रबंधन
महत्वपूर्ण विकास के समय उर्वरक का समय और डालना दूसरा महत्वपूर्ण कार्य था। यह बताया गया कि प्रति हेक्टेयर 
120 किलो नाइट्रोजन, 60 किलो फास्फोरस और 30 किलो पोटाश अधिकतम उत्पादकता के लिए आवश्यक हैं। 
नाइट्रोजन को 60-60 किग्रा के रूप में दो बार डालना चाहिए पहली सिंचाई के समय तथा इस समय पूरा फास्फोरस 
और पोटाश डालना चाहिए। हाल ही में, 180 किग्रा एन/हे. (लगभग 150 किग्रा/ हे. के साथ) गेहूँ की नई किस्में उगाई गई हैं। 
भारत-गंगा के मैदानी इलाकों में धान-गेहूँ की उत्पादकता बढ़ाने के लिए एक हेक्टेयर में 25 किग्रा जिंक का प्रयोग देखा
 गया है। हाल ही में गेहूँ के प्रोटीन सामग्री और उत्पादकता को बढ़ाने के लिए सल्फर का उपयोग देखा गया है। 
एमएन (इंडो-गंगा के मैदानी इलाकों में बोरे) की प्रतिक्रिया और बोरान (पूर्वी और सुदूर पूर्वी क्षेत्र) का उपयोग भी लाजमी देखा
 गया है।.
पोषक तत्व प्रबंधन
गहन कृषि के साथ, आवश्यक पोषक तत्वों की कमी भी विस्तृत हो गई है। फसलों और मिट्टी में सूक्ष्म पोषक तत्वों पर 
अखिल भारतीय समन्वित अनुसंधान परियोजना के तहत किये गए कार्यों में, भारत में मिट्टी में जिंक की कमी की व्यापकता
 को प्रदर्शित किया गया है। राष्ट्रीय स्तर पर, सूक्ष्म पोषक तत्वों में कमी का स्तर : जिंक 46%, बोरान: 17%, 
मॉलीबेडनम: 12%, आयरन: 11% और कॉपर: 5% है। सल्फर की कमी भी मिट्टी की एक विस्तृत श्रृंखला (38%) में दर्ज की गई है। 
अनाज, बाजरा, तिलहन और दालों आदि 
सहित 40 से अधिक फसलों में सल्फर की उपज प्रतिक्रिया प्राप्त की गई है। संभावित उपज का पता लगाने के लिए, 
रणनीतियों में शामिल हो सकते हैं
  • लक्षित पैदावार के लिए स्थान विशिष्ट पोषक तत्व प्रबंधन
  • अकार्बनिक उर्वरकों के साथ फसल अवशेषों, जैव उर्वरकों आदि का एकीकरण
  • पोषक तत्व प्रयोग क्षमताओं में वृद्धि करने के लिए एफआईआरबीएस जैसी जुताई तकनीकें
  • कुशल पोषक तत्व प्रबंधन के लिए सुदूर संवेदन
  • पोषक तत्व प्रबंधन, पुआल गुणवत्ता के साथ साथ मानव और पशु स्वास्थ्य
    wheat producing states in india




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